मोबाइल ने कर दिया है सब काम आसान
जब मोबाइल का दौर शरू हो रहा था लगभग 2000 के करीब लोगो के हाथो मैं मोबाइल आने लगे थे पर उतनी क्रांति नही आई थी उन दिनों, एक मैगज़ीन के लिए एक आर्टिकल लिखा था " मोबाइल सेवा " तब मैंने भविष्य को सोच कर वो कल्पना की थी जो अब हालत हो गई है, मसलन सब्जी को फ़ोन करके सब्जी मंगवाई जाएगी कही पास मैं जाना हो तो रिक्शे वाले को फ़ोन करो आ जायेगा, पर अब ये आम बात है फोन आते ही सब मोबाइल हो गये हैं तुरंत इधर से उधर ... चलो मोबाइल आ गये बोहत सुविधा हो गई घंटो का काम मिनटों मैं अब हो जाता है , पर अब समस्या ये है अब मोबाइल मोबाइल ना होकर ससुरा सब कुछ हो गया है ... इंटरनेट, गाने सुन लो, रेडियो भी है यही ही फिलिम भी चलती है, पर सुविधा है तो दुविधा भी तो आनी थी वो भी ससुरी आ ही गई, अब ई साला इसमें गड़बड़ ये है सुनो : मैंने एक मल्टी मीडिया मोबाइल खरीदा है मेमोरी कार्ड भी मिला है तो दुकानदार से कहा भाई तनिक इसमें सत्संग और भजन डाल दो मन रमा रहेगा, बोला वो वाली फिलिम भी डाल दूँ ? हम कहे नहीं भैया हम फिलिम नही देखते कहने लगा वो वाली, अरे भाई वो पर इतना जोर क्यों दे रहे हो तो बाजू बाले लड़के ने (जो करीब 15 बरस का होगा) साफ़ साफ़ ही बोल दिया, राम राम राम ... क्या ज़माना आ गया है तो देखा बात यहाँ से बिगड़ रही है बच्चो के हाथो मैं मोबाइल आते हैं तो ये "वो" वाली फिलिम देखते हैं जिससे अभिभावक अनभिज्ञे होते हैं, और फिर युवाओं मैं वो वाली फिल्म के आसन करने की इच्छा भी जागती है जिसका परिणाम हम समाज मैं देख ही रहे हैं, अभिभावकों से निवेदन है की बच्चो के मोबाइल समय समय पर चेक करते रहे सीबीआई की तरह हर हफ्ते छापा मारते रहे, शुरुआत यही से होती है जो अब विकराल रूप ले रही है कुछ पंक्तियाँ -- "मोबाइल ने कर दिया है सब काम आसान, अब बच्चे भी समय से पहले हो रहे हैं जवान"
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