कल एक अरसे बार मेट्रो मैं बैठा,

कल एक अरसे बार मेट्रो मैं बैठा, कुछ तो दिल्ली मैं गर्मी कर कहर और फिर पट्रोल पर लगी आग, मुख्य वजह क्या होगी आप अंदाज़ा लगाइए बहरहाल अपनी गाडी सीलमपुर मेट्रो स्टेशन पर खड़ी की और चल पड़ा मेट्रो की तरफ साकेत जाना था, मेट्रो मैं घुसते ही बड़ी राहत मिली पर बैठने के लिए जगह नही मिली तो दरवाज़े के पास ही टेक लगा के खड़ा हो गया.. जैसे ही एक स्टेशन गुज़रा मेट्रो रुकी दरवाज़ा खुला तो एक मोहतरमा बड़ा भरी सा शरीर संभाले दरवाज़े की और बढ़ी कही ट्रेन छूट ने जाये इस वजह से एक लड़के से टकरा भी गई और लड़का जैसे ख़ुशी से पागल सा हो गया, सोच रहा होगी की काश कुछ जोर से टकराती... खैर वो मोहतरमा लगभग २५ की होगी मतलब लड़की जैसी ही थी, आकर मुझ से कुछ दूरी पर ही खड़ी हो गई दरवाज़ा बाद हुआ और फिर उनका बनना सवरना शरू हो गया दरवाज़े के शीशे मैं बालो को सवारना फिर पर्स से रुमाल निकला चेहरे को साफ़ किया और फिर न जाने क्या क्या किया, खुद को सवारने मैं इतनी मसरूफ थी जितना की मैं उनकी ये हरकते देखने मैं मशरूफ था, स्टेशन आते रहे लोग चढ़ते रहे उतारते रहे, और वो लड़की खुद को अभी तक सवरती रही, ५ स्टेशन गुजरने के बाद, अब उसने महंगा सा फ़ोन निकला जिसमें एक छोटा सा टैडी भी लटका हुआ था खैर उसने किसी को फ़ोन मिलाया और बातो का सिलसिला शरू हो गया कभी वो हंसती कभी नाराज़ होती और कभी..... खैर कुछ देर बाद अब मेसेज का सिलसिला शरू हो गया... आप ये बिलकुल मत समझना की ट्रेन मैं बस एक वही लड़की थी ट्रेन भरी हुई थी कुछ स्टुडेंट नीचे बैठे हुए थे सामने सीट पर एक बुज़ुर्ग अखवार के पन्ने पलट रहे थे और बोहत से लोग खड़े हुए थे पर मेरी नज़र उस लड़की पर थी जो अपना पूरा वज़न आपने टांगो पर संभाले हुए थी, देखने मैं ऐसी की उसके पीछे दो लडकियां आराम से छुप सकती थी, अब आप ये मत समझ लेना की वो लड़की मुझे पसंद आ गई थी, क्योंकि पसंद तो मुझे वो लड़की आई थी जो सामने वाली सीट पर बैठी थी जिसे बारी बारी से निहारता रहा और सफ़र कब गुज़र गया पता ही नही चला... :)

Comments

  1. मेट्रो की कुछ आम बातें जो दिन खास बना देती हैं...!
    बोहत खूब खुर्शीद साहब...!

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